Monday, January 3, 2011

सुख हासिल करने का राज !

मैं सुखी होना चाहता हूँ। घंटे भर  के  लिए नहीं। न ही एक या दो दिनों के लिए। बल्कि पूरी जिंदगी के वास्ते। मेरा ख्याल है हर इंसान सुख प्राप्त करना चाहता है।... दुनिया के अंदर सुख हासिल करने के उतने ही तरीके है जितने इस धरती पर इंसान हैं। पहले तो मुझे दो चीजों में फ़र्क बता लेने दीजिए। पहली, सुखी जीवन, या स्थायी सुख की अवस्था । दूसरी, कुछ क्षणों का मजा या स्वादिष्ट अहसास। मैं बड़ा सुखी  महसूस करता हूँ जब मुझे शाहाना खाना मिल जाए या बढिया फिल्म देख लूं , या पुराना यार-दोस्त मिल जाए या जब  मौसम सुहाना हो जाए। मगर इन सब चीजों को मैं सुखी जीवन का आदि और अंत बिल्कुल नहीं मानता। ये तो तेज उड़ जाने वाले क्षण हैं। इनसे उस दिमाग का अंधेरा कतई दूर नहीं हो सकता जो दुखी रहने का आदी हो चुका है। मेरे विचार में, सुख तो एक सोचने की आदत हैं,स्थायी तौर पर अच्छा महसूस करने की हालत है। यह छोटी-मोटी तकलीफों से आजाद हैं; जैसे खराब मौसम, या ज्यादा सैंक लगा हुआ भोजन। सुख तो कभी  न छूटने वाली वो आदत है जिसके जरिए आप हमेशा चीजों के रौशन रुख को ताकते हैं। ...वे कौन-सी चीजें हैं जिनकी मुझे जरुरत है,या कौन-से कार्य हैं जो मुझे करने चाहिएं,ताकि मेरा जीवन सुखी व्यतीत हो सके?...सबसे अधिक महत्व मैं देता हूं अपनी बुनियादी जरुरतों की पूर्ति को। सुखी होने के लिए लाजमी है कि आदमी के पास उचित आराम के साधनों के वास्ते धन हो। वे वस्तुएं जो धन से खरीदी जा सकती हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि मेरे पास करोड़ो रुपए हों, धन दौलत हो-ताकि  मैं निठल्लों वाली सुस्त और ऐशो इशरत वाली जिंदगी काट संकू। नहीं! मैं पैसे का गुलाम ,ऐशपरस्ती का कैदी नहीं बनना चाहता ।  अकेली दौलत इंसान को सुखी नहीं बना सकती। धन से मुझे सिर्फ दो चीजें चाहिएं। पहली, सुरक्षित होने की भावना। दूसरी, फ़ुर्सत, खाली समय।  मैं यूनानी फिलासफर डाओजनीज नहीं हूं -जिसने सिकंदर महान से अपनी धूप के सिवा और कुछ नहीं था मांगा। मेरा ख्याल है, धन के बगैर बंदा सुखी  नहीं हो सकता। खुराक और पोशाक और सिर पर  छत संपूर्ण जीवन के वास्ते  उतने ही आवश्यक हैं जितनी  हमारे सांस लेने के वास्ते हवा। अगर डाओजनीज ने लंबे-चौड़े परिवार के पेट भरने होते, मगर गांठ में धेला न होता, उसको अपनी सुख प्राप्त करने की फिलासफी के अंदर की मूर्खता झट पता लग जाती।... जैसा मैंने पहले कहा, फालतू धन हमें अधिक सुख देने की बजाए हमारे सुख को घटा भी सकता है। आदमी की इच्छाओं का कोई अंत नहीं। धन उसके जीवन को आलसी और निकम्मा बना सकता है। इसी वजह से, इंसान को चौकन्ना  रहना चाहिए। वह अपनी ख्वाहिशों को न बढ़ाए। क्योंकि हमारी सारी-की-सारी तमन्नाएं कभी पूरी नहीं हो सकतीं,अक्ल इसी में है कि हम ख्वाहिशों को घटा के रखें।नहीं तो यकीनी तौर पर हम निराश और दुखी हो जाएंग़े।

अपनी बुनियादी जरुरतों के पूरा होने के बाद, जिस चीज की हमें सुख प्राप्ति के हेतु, सबसे ज्यादा जरुरत है वह है: सब्र ! संतोष ! संतुष्टि के अंदर वह भेद छुपा हुआ है जो हमें चिरंजीव सुख प्रदान करा सकता है। मुझे याद आ रहा है गांधीजी  का जवाब जो उन्होंने एक अग्रेंज लड़्की को दिया था। लड़की ने पूछा: सुख हासिल करने का राज क्या है?..."यह तो बहुत सरल है", गांधीजी बोले। "जिस दिन तुम्हें रोज सवेरे मिलने वाला दूध का प्याला नहीं मिलता, तुम पानी का गिलास पी लो और उसी से संतुष्ट महसूस करो।" इसका मतलब  यह नहीं कि गांधीजी  कहते हैं तुम हर रोज का दूध पीना बंद कर दो, तो ही सुखी रहोगे। सिर्फ  एक दिन , जब तुम्हें दूध नहीं मिलता, हल्ला मत मचाओ। संक्षेप में: अपनी जिंदगी में सब्र संतोष से रहना सीखो। नन्ही-नन्ही मुशिकलों के कारण , दुखी मत हो। एक और चीज जो मैं सुखी जीवन के लिए अनिवार्य समझता हूं, वह है : काम-लगातार मेहनत। जो सुख  अत्यंत दिलचस्प काम दे सकता है, वह और कहीं से नहीं मिल सकता। नाट्ककार बरनर्ड शॉ ने एक बार लिखा: " दुखी होने का भेद जानना चाहते हो? बेकार बैठो  और सोचो: मैं सुखी हूं कि दुखी हूं ?" -यह सही है। निठल्लेपन से जनमते हैं दुखद विचार, जैसे टिड्डी द्लों से जनमते हैं टिडिडयों के बादलो के बादल। इंसान को किसी लाभदायक कार्य में जुटे रहना चाहिए। महान वैज्ञानिक न्यूटन के बारे में एक कहानी सुनाई जाती है। एक बार न्यूटन ने कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाया। वह शराब की बोतल लाने के लिए मेज से उठ गया। लेकिन वह लौटकर नहीं आया। चौबीस घंटो के बाद , उसके नौकर ने देखा, न्यूटन अपनी प्रयोगशाला के अंदर तजुरबे करने में मग्न है। वह अपने मेहमानों को, खाने को,आराम और नींद को,पूरी तरह भूल चुका है। इस तरह का हर्षोन्माद हर कामगार को हासिल नहीं होता। लेकिन इससे यह जरुर जाहिर हो जाता है कि हमारे ढेर सारे फिक्र और मुशिकलें कभी पैदा ही नहीं होते अगर हमारे जीवन में महान लक्ष्य हो तथा करने के वास्ते अंतहीन काम  हो।

जिस काम को आदमी करे वो काम अपने  फायदे के वास्ते तो होना ही हुआ। साथ ही यह कार्य समाज की भलाई के वास्ते भी हो। एक खुदगर्ज बंदा कभी सुखी नहीं हो सकता । मिसाल के तौर एक चोर को ले लो। दूसरों को लूटने के वास्ते जितनी मुशक्कत चोर करता है, उसमें से उसे सुख कभी हासिल नहीं हो सकता। सुखी जीवन स्वार्थहीन जीवन होता है। जरुरतमंदो की मदद करने  से, इंसानियत की खुशियों में बढोतरी करने से आनंद प्राप्त होता है। किसी मुजरिम को, डाकू को, गरीबों का शौषण करने वाले को, कभी मन की शांति नहीं  मिल सकती । और इसके उलट अपने आपकी कुर्बानी हमें नेक बनाती है। हमारा आत्मसम्मान बढ़ाती है। दूसरों के लिए जीने वाला महापुरुष सदा के लिए सुखी रहेगा। गांधीजी और नेहरु ने अपनी जिंदगियां  अपने देशवासियों को सुखी बनाने के वास्ते खर्च कर  दी। उन्होंने कई बरस फिरंगी की जेलों में काटे। अनगिनत कष्ट झेले। लेकिन वे दुखी  नहीं थे। जालिम उनके शरीरों को यातना दे सकते थे मगर  उनकी रुहें स्थायी उजाले में रहती थीं। दूसरों की भलाई के लिए काम करने की ललक उनको हर वेला सुखी और उत्साहित रखती थी। भगत सिंह को अंग्रेंजो ने  फांसी पर चढ़ाया, लेकिन उससे ज्यादा सुखी मौत और किसी को भी नसीब नहीं हुई। सुख वह शै है जो आपको मिलती है जब आप इसे दूसरों में बांट देते हैं। स्वार्थी बनो और दूसरों का सुख छीनने की कोशिश करो, तुम कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकते। असल में सुख और दिल की नेकी एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। जो मनुष्य दूसरों से नफरत करता है और नुकसान पहुंचाने की कोशिश करता है, वह अवश्य ही दुखी होगा। दूसरों को दुख देने का एक भी  विचार आपकी खुशी तबाह कर सकता है। "अपने पड़ोसियों से प्यार करो।" यह मात्र धार्मिक शिक्षा नहीं है। यह तो जीवन का सदाबहार सत्य है। इसको सुखी जीवन का सूत्र स्वीकार करना चाहिए।"किसी से नफरत नहीं, हर एक से प्यार।"(अब्राहम लिंकन)

जीवन के लिए प्यार जरुरी है। सिर्फ बाहर  की दुनिया के लिए प्यार नहीं चाहिए। केवल पराए लोगों के  वास्ते ही जीना नहीं चाहिए। बल्कि,इंसान को अपने यारों-दोस्तों से, सगे-संबंधियों से भी घनिष्ट प्रेम-बंधन गांठने चाहिए। अपने परिवार के सदस्यों की मुहब्बत के बगैर इंसान सुखी नहीं हो सकता । वह सबका प्रेम प्राप्त करे। और सबको मोह प्यार दे। दोस्ती जैसी सुखदायक  वस्तु दुनिया में दूसरी कोई नहीं। हमारे मित्र हमें सैकड़ो दुखो तकलीफो से बचा सकते हैं। जबकि मित्रहीन जिंदगी  कइयों को आत्महत्या करने पर  मजबूर कर देती है।
संक्षेप में: मेरी दृष्टि में, एक सुखी जिंदगी वो होती है जिसमें जरुरी  आराम की चीजें हों, मगर ऐशपरस्ती न हो। इसमें किसी किस्म का अभाव महसूस न हो। सब्र संतोष हो। इसके लिए आवश्यक है कि आदमी तगड़ा काम करे जो इंसानियत  की भलाई की खातिर हो। सबसे अहम बात-एक सुखी  जीवन रिश्तेदारों  और दोस्तों की संगत में, दूसरों के वास्ते  जिया जाए।

 नोट-यह अंश सी.डी सिंद्धू सर की किताब-नाट्ककार चरणदास सिंद्धू शब्द-चित्र से लिया गया है जिसका संपादन रवि तनेजा सर ने किया है और श्री प्रकाशन ने इस किताब को प्रकाशित किया है। इस अंश को यहाँ पोस्ट करने का मकसद केवल ये है कि अक्सर यार दोस्तों और नजदीकीयों से सुनने को मिलता है " यार जिंदगी में मजा नहीं आ रहा। " उनके पास सवाल है जवाब नहीं। इसलिए मुझे लगा इस लेख में कुछ हद तक जवाब है। इंसान जिंदगी मजे से जीए बस यही चाहते है हम।  

6 comments:

vijay kumar sappatti said...

susheel ji , bahut hi saargarbhit lekh... paghkar man ki uljhan kuch kam hui .. jeevan ki narantarta ko banaye rakhne ke liye ... is lekh ko har kisi ne ek baar to padhna hi chahiye ...

salaam ...

mera pranmm guru ji ko ..

naia ko happy new year...

aapka
vijay

vandana gupta said...

सबसे पहले तो नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें और ब्लोग जगत मे नव वर्ष मे आपकी पहली पोस्ट पढकर दिल खुश हो गया नही तो लगता था आपने तो ब्लोगजगत को बिल्कुल ही छोड दिया।
बेहद उम्दा और शानदार् पोस्ट …………ज़िन्दगी जीने का ढंग सिखाती है………………आभार्।

abhi said...

बहुत दिनों के बाद लिखे हैं भैया,
लेकिन हर बात एकदम सौ फीसदी सही है...
आपके हर विचार से सहमत..

Creative Manch said...

बहुत ही सारगर्भित
और
मनन करने लायक पोस्ट है.
बहुत सुन्दर

आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जीवन में संतुष्टि आ जाये तो जीवन सच ही सुखी हो जाये ...अच्छा लेख

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर, आप की पोस्ट दोबारा ओर फ़ुरस्त से पढुंगा, वेसे जीवन की खुशी तो हमारे पास ही हे, हम उसे दुनिया के बाजार मे ढुढते फ़िरते हे, धन्यवाद

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